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क्या राजीव गांधी की हत्या की गुत्थी कैनेडी की तरह अनसुलझी ही रह जाएगी?


Lucknow: ‌स्वतंत्र प्रभात प्रयागराज से दया शंकर त्रिपाठी की समीक्षात्मक रिपोर्ट। ‌आज प्राइम विडियो पर जेएफके फिल्म देख रहा था जो अमेरिका के बेहद लोकप्रिय राष्ट्रपति जॉन एफ कनेडी हत्याकांड पर आधारित है। 22 नवंबर 1963 को  डलास में हुए हत्याकांड का रहस्य 57 वर्षों बाद भी रहस्य ही बना हुआ है। कुछ इसी तरह भारत के पूर्व प्रधानमन्त्री राजीव गाँधी की 21 मई 1991 को तमिलनाडु में श्रीपेरंबदूर में आत्मघाती हमले में नृशंस हत्या हुई और 29 साल बाद भी अभी हत्याकांड की साजिश का पर्दाफाश नहीं हो सका है।     ‌22 नवंबर 1963 को एक मिनट पहले अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी मुस्कराते हुए भीड़ की ओर हाथ हिला रहे थे। उनके साथ लिमोजिन कार में बैठी टेक्सास के गवर्नर की पत्नी नेल्ली कोनाली कहती हैं, मिस्टर प्रेसिडेंट आप नहीं कह सकते कि डलास की जनता आपको नहीं चाहती है। एक क्षण बाद कैनेडी अपना गला पकड़ लेते हैं। फिर जैसे उनका सिर फट पड़ता है। खून और मांस के टुकड़े उनकी पत्नी जैकलीन को भिगो देते हैं। जॉन एफ कैनेडी की हत्या एक पेचीदा गुत्थी है। सत्तावन वर्ष बाद भी यह हत्याकांड संदेह और दोषारोपण के दायरे में है। एक सदस्यीय वारेन जांच आयोग के निष्कर्ष राज खोलने में सहायक साबित नहीं हुए ‌भारत में राजीव गाँधी हत्याकांड के बाद कांग्रेस की ही चुनी सरकार पीवी नरसिंह राव के नेतृत्व में बनी थी और हत्यारे इस वजह से फांसी के फंदे से बच गये कि समय पर दया याचिका का निपटारा नहीं हुआ। देश के क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम का इससे बड़ा मजाक भला क्या हो सकता है। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी हत्याकांड में यही हुआ। यही नहीं राजीव गांधी की हत्या के मामले में बड़ी साजिश की जांच कर रही मल्टी डिस्पलेनेरी मॉनिटरिंग अथॉरिटी (एमडीएमए) आज तक जाँच ही कर रही है और अब तक इसकी कोई रिपोर्ट उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप के बावजूद सामने नहीं आई है। ‌क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम का सर्वमान्य सिद्धांत है कि किसी की मौत से सर्वाधिक लाभान्वित होने वाले ही जाँच के राडार पर चढ़ाये जाते हैं। राजीव गाँधी हत्याकांड के बाद राजनीतिक सुप्तावस्था में चल रहे पीवी नरसिंह राव प्रधानमन्त्री बन गये जबकि उनकी कोटरी में शामिल चंद्रास्वामी जरूर साजिश की जाँच के दायरे में आये पर जब राव साहब स्वयं प्रधानमंत्री थे तो कैसी जाँच हुई होगी यह किसी से छिपी नहीं है। ‌21 मई 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में लोकसभा चुनाव की जनसभा में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की रात के सवा 10 बजे लिट्टे की एक आत्मघाती हमलावर धनु के विस्फोट में राजीव गांधी समेत 18 लोगों की मौत हो गयी थी। दरअसल राजीव गांधी हत्याकांड लचर क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम का भी उदाहरण है। एक पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या होती है। ऊपरी अदालत से भी मौत की सजा पाए 4 दोषी कभी फांसी के फंदे तक नहीं पहुंचे। आखिरकार उनकी मौत की सजा उच्चतम न्यायालय की उस पीठ से इस आधार पर माफ हो जाती है कि दोषियों की दया याचिकाओं के निपटारे में देरी हुई, जिसके पीठासीन जज तत्कालीन तमिल मुख्य न्यायाधीश सदाशिवम थे। सदाशिवम को इसके पुरस्कार स्वरूप केरल का राज्यपाल बना दिया गया।   ‌यह भी शोध का विषय है कि एक पूर्व पीएम की हत्या मामले में भी दया याचिकाओं पर भी सरकारें कुंडली मारकर बैठी रहीं। 28 जनवरी 1998 को स्पेशल टाडा कोर्ट ने सभी 26 दोषियों को मौत की सजा सुनाई। सुनवाई के दौरान करीब एक हजार गवाहों के लिखित बयान दर्ज हुए। 288 गवाहों से अदालत में जिरह हुई। 10 हजार से ज्यादा पन्नों के 1477 दस्तावेज अदालत में जमा किए गए।11 मई 1999 को सुप्रीम कोर्ट ने 19 दोषियों को बरी कर दिया। 4 दोषियों- मुरुगन, संथन, पेरारिवलन और नलिनी की मौत की सजा को बरकरार रखा तो 3 दोषियों रॉबर्ट पयास, जयकुमार और रविचंद्रन की मौत की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया।  ‌8 अक्टूबर 1999 को सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा पाए चारों दोषियों की अपील को भी खारिज कर दिया। मुरुगन नलिनी का पति है। नलिनी 29 सालों से जेल में बंद है। मुरुगन श्रीहरण श्रीलंका के जाफना से आया था। वह एलटीटीई का ट्रेनर और बम एक्सपर्ट था। उसने खुद कबूला था कि उसे सीधे एलटीटीई चीफ प्रभाकरण से निर्देश मिलते थे। मुरुगन ने नलिनी से शादी की। राजीव हत्याकांड में इस दंपति को मौत की सजा हुई जो बाद में ताउम्र कैद में बदल दी गई। अभी वह जेल में सजा काट रहा है। ‌तीन दोषियों, संथन, मुरुगन और पेरारिवलन की दया याचिकाओं को राज्य सरकार ने राष्ट्रपति के पास भेज दिया। गांधी परिवार ने भी सरकार से नलिनी की मौत की सजा को माफ करने की अपील की। आखिरकार साल 2000 में केंद्र ने नलिनी की मौत की सजा को माफ कर दिया। 11 सालों तक तीनों दोषियों की दया याचिका राष्ट्रपति के पास लंबित रही। 12 अगस्त 2011 को राष्ट्रपति ने संथन, मुरुगन और पेरारिवलन की दया याचिका को खारिज कर दिया। दया याचिका खारिज होने के बाद संथन, गुरुगन और पेरारिवलन को फांसी दिए जाने की तारीख मुकर्रर हो गई। तय हुआ कि 9 सितंबर 2011 को तीनों को फांसी दी जाएगी। तैयारियां चल रही थीं। इस बीच फांसी की तिथि से 10 दिन पहले 30 अगस्त 2011 को तमिलनाडु विधानसभा ने तीनों की मौत की सजा माफ करने का प्रस्ताव पास करते हुए राष्ट्रपति के पास अनुरोध भेजा। उसी दिन मद्रास हाई कोर्ट ने तीनों की फांसी पर रोक लगा दी। ‌बाद में मामला उच्चतम न्यायालय पहुंचा। इस तरह तीनों दोषियों को फांसी होते-होते रह गई। उच्चतम न्यायालय ने दया याचिकाओं के निपटारे में देरी के आधार पर 18 फरवरी 2014 को मुरुगन, संथन और पेरारिवलन की मौत की सजा को माफ कर दिया। इसके खिलाफ केंद्र ने क्यूरेटिव पेटिशन डाली लेकिन 29 जुलाई 2015 को शीर्ष अदालत ने इसे खारिज करते हुए तीनों दोषियों की मौत की सजा को ताउम्र कैद में बदल दी। राजीव गांधी हत्याकांड के सभी सातों दोषी पिछले 29 सालों से जेल में बंद हैं। ‌इस बीच नवम्बर 2019 में  उच्चतम न्यायालय ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के मामले में बड़ी साजिश की जांच कर रही मल्टी डिस्पलेनेरी मॉनिटरिंग अथॉरिटी (एमडीएमए) की स्टेटस रिपोर्ट पर कड़ी नाराज़गी जताई थी । सुनवाई के दौरान जस्टिस एल नागेश्वर राव की पीठ ने जानना चाहा है कि इस मामले की जांच में दो साल के भीतर क्या हुआ? पीठ ने केंद्र को निर्देश दिया कि वो इस संबंध में नई स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करे। दरअसल 5 नवंबर 2019 को उच्चतम न्यायालय ने एमडीएमए से चार सप्ताह में नई स्टेटस रिपोर्ट मांगी थी जिस पर केंद्र ने ये रिपोर्ट दाखिल की थी। पीठ ने ये आदेश दोषी एजी पेरारीवलन की आजीवन कारावास की सजा के निलंबन की याचिका पर दिया था । ‌हत्या के विभिन्न पहलुओं की पड़ताल के लिए जस्टिस जेएस वर्मा (सर्वोच्च न्यायालय) और जस्टिस एमसी जैन (उच्च न्यायालय) के नेतृत्व में महत्वपूर्ण जांच आयोग गठित किए गए। इन आयोगों ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी। न्यायमूर्ति वर्मा ने सुरक्षा चूक और उसकी खामियों पर रोशनी डाली। न्यायमूर्ति एमसी जैन ने हत्या में साजिश के कोण की जांच की और इससे जुड़े कुछ बिंदुओं को उजागर किया। जैन कमीशन की सिफारिश के आधार पर मामले की आगे जांच के लिए सीबीआई की देखरेख में मल्टी डिस्पलेनेरी मॉनिटरिंग अथॉरिटी बनाई गई थी, लेकिन 20 साल बीत जाने पर भी जांच आगे नहीं बढ़ी। राजीव गाँधी की हत्या के षड्यंत्र में द्रमुक और तमिलनाडु के अन्य राजनीतिक दल भी शक के घेरे में थे।   ‌इस आयोग ने कहा था कि सुरक्षा व्यवस्था में तमिलनाडु के कांग्रेसियों द्वारा की गयी गड़बड़ी के चलते ही गांधी को हमले से नहीं बचाया जा सका। इस बात पर कभी फोकस करने का उपक्रम ही नहीं किया गया कि तमिलनाडु सहित दिल्ली में ऐसे कौन कांग्रेसी थे, जिन्होंने बार-बार इस बात के लिए दबाव बनाया कि गांधी का श्रीपेरेम्बदूर दौरा रद्द नहीं किया जाए। काफी पड़ताल के बाद भी इस बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती कि हत्याकांड से कुछ दिन पहले गांधी से मिलकर उन्हें सुरक्षा का आश्वासन देने वाले लिट्टे के सदस्यों की यह मुलाकात का बंदोबस्त किसने किया था। राजीव की हत्या के बाद ही भारत सरकार ने लिट्टे को प्रतिबंधित किया था। इससे पहले उसकी गतिविधियों पर यहां कोई रोक नहीं थी। The post क्या राजीव गांधी की हत्या की गुत्थी कैनेडी की तरह अनसुलझी ही रह जाएगी? appeared first on दैनिक स्वतंत्र प्रभात हिंदी अख़बार.