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रक्षा बंधन व संस्कृत दिवस पर विशेष


Lucknow:

सामाजिक वचनबद्धता का पर्व है रक्षा बंधन

श्रावणी पूर्णिमा को ही मनाते है संस्कृत दिवस

लेखिका - डॉ० कामिनी वर्मा

लखनऊ उत्तर प्रदेश

 

सर्वधर्म समभाव की भावना से युक्त भारत की गौरवमयी संस्कृति

पग पग पर धर्म से नियोजित है।

प्राण जाय पर वचन न जाय

की रीति का अनुसरण करता रक्षा बंधन पर्व का रक्षा सूत्र न सिर्फ रक्षा का वचन देता है अपितु प्रेम,निष्ठा, समर्पण, दायित्व , निर्वहन का भी भाव जागृत करता है ।

श्रावण मास की पूर्णिमा को बहनें उत्साह व विश्वास के साथ भाई के लिए मंगलकामना करते हुए उनकी कलाई पर प्रेम का बंधन सजाती हैं। भाई भी इस स्नेह बंधन का सम्मान करते हुए उनकी सुरक्षा का वचन देता है । शास्त्रों में उल्लिखित है जब संसार में नैतिक मूल्यों का अवमूल्यन होने लगता है तब भगवान शिव प्रजापति द्वारा  पृथ्वी पर पवित्र धागे भेजते हैं जिन्हें बहनें, भाई को नकारात्मक विचारों से दूर रखने की सदकामना करते हुए बाँधती हैं।

    वस्तुतः रक्षा बंधन रक्षा भाव के संकल्प को स्मरण करने का उत्सव है । इस दिन न सिर्फ बहनें भाई को बल्कि आश्रित व असहाय जनसमाज भी स्वरक्षार्थ व प्रेम भाव को प्रदर्शित करने के लिए मस्तक पर तिलक लगाकर कलाई पर यह पवित्र धागा बंधता है।

गुरुओं द्वारा शिष्यों को ,जनता द्वारा देश के प्रहरियों व मुखिया को भी रक्षा सूत्र बांधा जाता है। इतिहास बताता है कि सिकन्दर व पोरस ने युद्ध से पूर्व एक दूसरे को यह धागे प्रेषित कर रक्षा का संकल्प लिया था।अतः युद्ध के दौरान पोरस ने सिकन्दर पर जब मारक प्रहार हेतु हाथ उठाया तो सिकन्दर ने योद्धा का सम्मान व रक्षा धर्म का निर्वहन करते हुए उसका राज्य वापिस कर दिया था ।

पौराणिक आख्यान के अनुसार राजा बलि को दिए गए वचन का पालन करने के लिए भगवान विष्णु को बैकुंठ छोड़कर बलि के राज्य की रक्षा के लिए चले जाने पर लक्ष्मी ने ब्राह्मणी वेश धारण करके श्रावण पूर्णिमा के दिन राजा बलि के लिए मंगल कामना करते हुए उसे राखी बाँधी थी । राजा बलि ने प्रसन्न होकर लक्ष्मी जी को बहन मानते हुए उनकी रक्षा का संकल्प लिया तब लक्ष्मी ने अपना वास्तविक रूप धारण किया और उनके कहने से बलि ने इंद्रदेव से बैकुंठ वापिस करने का निवेदन किया। 

अन्य साक्ष्य के अनुसार मुगल शासक हुमायूं के चित्तौड़ पर आक्रमण को रोकने के लिये राणा सांगा की विधवा रानी कर्मवती ने हुमायूँ को राखी भेजकर अपनी रक्षा का निवेदन किया। स्वाधीनता संग्राम में बंग भंग आंदोलन का आरम्भ एक दूसरे को रक्षा धागा बांधकर किया  गया। बहनों ने  राखी बांधकर भाइयों से देश रक्षा का वचन लिया।

     दक्षिण भारत के समुद्री क्षेत्र में नारियल पूर्णिमा के नाम से मनाए जाने वाले इस त्यौहार में समुद्र देव पर नारियल चढ़ाकर पूजा की जाती है।बुंदेलखंड में कटोरे में जौ व धान बोकर शक्ति की आराधना करते हुये इसे कजरी पूर्णिमा या कजरी नवमी के रूप में मनाते हैं।

      संपूर्ण भारत में विविध नामों व भिन्न भिन्न स्वरूपों में मनाया जाने वाला यह त्यौहार महाकवि कालिदास की उत्सव प्रियाहि मानवः उक्ति को सार्थक करता हुआ सामाजिक समरसता एवं मानवीय रिश्तों को सुदृढ़ करने की वचन बद्धता को संजोता है ।                                                                    

                                                                            भारतीय कैलेंडर के अनुसार श्रावण मास की पूर्णिमा को ही सम्पूर्ण विश्व में संस्कृत दिवस मनाया जाता है। संस्कृत भाषा को देवभाषा होने का गौरव प्राप्त है ।संसार की समस्त भाषाएं मानवजनित हैं ,परंतु संस्कृत देव प्रसूत ,अतः इसे देववाणी भी कहते हैं।

     ऐसी मान्यता है ब्रह्मांड की समस्त तकनीक वायुमंडल में आध्यात्मिक शक्ति के उदघोष के रूप में विद्यमान है जैसा कि उपनिषद के निम्न मंत्र से स्पष्ट होता है-

 तस्मात् एतस्मात आकाशः सम्भूतः,आकाशाद वायुः,वायोर्अग्नि:,अग्नेराप:,अदभ्यः,पृथिवी,पृथिव्या ओषध्यः

रमात्मा ने शब्दों के माध्यम से आकाशवाणी की । शब्द नित्य हैं, ये आकाश में विचरण करने लगे जिन्हें ऋषियों ने दीर्घकालीन तपस्या व चिंतन के फलस्वरूप प्राप्त करके संकलित किया। इन्हीं सूक्तों का संकलन वेदों के रूप में प्राप्त होता है।अतः वेदों को श्रुति व अपौरुषेय माना जाता है। वेद विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ हैं।अतः संस्कृत विश्व की प्राचीनतम भाषा है । मानव जीवन के लिए अपेक्षित समस्त आध्यात्मिक, नैतिक, राजनीतिक , सामाजिक ज्ञान वेदों में उपलब्ध है। विश्व का समृद्धतम साहित्य संस्कृत भाषा में है ।

वेद व्यास द्वारा संकलित 4 वेद, 6 वेदांग, 18 पुराण, 108 उपनिषद, ब्राह्मण ग्रंथ, स्मृतियां संस्कृत में है । लौकिक संस्कृत में भी प्रचुर साहित्य उपलब्ध है । संस्कृत के शब्दकोश में 102 अरब , 78 करोड़ 50 लाख शब्द हैं । जो विश्व की किसी भाषा में सर्वाधिक है । वर्तमान में विश्व की समस्त भाषाओं में वैज्ञानिक व तार्किक दृष्टि से सर्वाधिक परिमार्जित भाषा है ।जिसे जुलाई में 1989 में फोब्र्स पत्रिका ने कंप्यूटर सॉफ्टवेयर के लिए सबसे अच्छी भाषा माना  है।

कंप्यूटर द्वारा गणित के प्रश्नों को हल करने की विधि अंग्रेजी में न होकर संस्कृत में है। अन्य भाषाओं की तुलना में संस्कृत में सबसे कम शब्दों में वाक्य पूरा हो जाता है। संस्कृत में बात करने से तंत्रिका तंत्र क्रियाशील रहता है। अमेरिकन हिन्दू विश्वविद्यालय के अनुसार संस्कृत में बात करने से रक्तचाप, मधुमेह व कोलेस्ट्रॉल आदि की समस्या में भी कमी आती है। यह भाषा चित्त को एकाग्र रखने में भी उपयोगी है।

प्राचीन काल मे संस्कृत जनमानस की भाषा थी , इसे राष्ट्रीय भाषा का महत्व प्राप्त था। परन्तु अरब आक्रमण के बाद से इसका महत्व न्यून होता गया । आज अपनी क्लिष्टता के कारण यह जनवाणी न रहकर देववाणी रह गयी है। संस्कृत की वैज्ञानिकता , तार्किकता, व्याकरण, समृद्ध साहित्य को देखते हुये वेदों,उपनिषदों व संस्कृत साहित्य के कुछ अंश को पाठ्यक्रम में शामिल करके अपनी समृद्ध धरोहर को अक्षुण्ण बनाये रखने की आवश्यकता है, क्योंकि संस्कृत ही वह भाषा है जो मानव को संस्कारित करके देवत्व की प्राप्ति कराने में सक्षम है तभी संस्कृत दिवस मनाने का औचित्य है।